Tuesday, September 11, 2018

साथ महिला किसानों की लाशें उगीं...

“वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती. लेकिन जब उसकी शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गई. कुछ नहीं तो मेहमानों को सादा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था. इतने भी पैसे नहीं बनते थे. कहां से करते शादी? मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं. बस एक दिन अचानक चली गयीं”
यवतमाल का पिपरी बुट्टी गांव :
“सब जगह ढूंढा पर मां नहीं मिलीं...फिर गांव के बाहर के कुएं पर गया. वहां देखा कि मां की चप्पल कुएं के बाहर पड़ी थी.
खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे, मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली. मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ. फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?”  sex
यवतमाल का ही वागधा गांव:
“कागज़ों पर हमारा कर्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार कर्ज़ था. जिन माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों से हमने कर्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे. मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती. अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़, हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद माँ बच जाती”.
राजधानी दिल्ली से लगभग 1200 किलोमीटर दूर स्थित महाराष्ट्र का अमरावती जिला बीच मानसून की हल्की फुहारों में भीगा हुआ है. चौड़ी सड़कें, चौतरफ़ा हरियाली और राज्य के विदर्भ इलाक़े में पड़ने वाले इस जिले का इंद्रधनुषीय आकाश आपके आसपास ख़ुशहाली का भ्रम रचता है.
लेकिन टीक के पेड़ों और काली मिट्टी के खेतों से सजे यह ख़ूबसूरत रास्ते विदर्भ के जिन गांवों तक जाते हैं, वहां अवसाद और दुख के सिवा कुछ नहीं है. पर विदर्भ के इस दुख के कारणों और इससे जुड़े आंकड़ों में जाने से पहले आइए आप को ले चलते हैं जिले की तिवसा तहसील में बसे शेंदुरजना गांव.
इस गांव में रहने वाले भास्कर और देवकू राव असोडे का घर ढूँढने के लिए हमें ज़्यादा भटकना नहीं पड़ता. गांव का हर बाशिंदा उस किसान के बारे में जानता था, जिसकी 2 जवान बेटियों ने हाल ही में बढ़ते क़र्ज़ के चलते आत्महत्या कर ली थी.
ज़्यादातर पुरुष किसानों की आत्महत्याओं के दस्तावेज़ों से अटी विदर्भ के कृषि विभाग की फ़ाइलों में दर्ज 24 वर्षीय माधुरी और 21 वर्षीय स्वाति की यह कहानी राज्य की ‘किसान बेटियों’ के हिस्से आने वाले संघर्षों की दास्तान है.
कीचड़ भरी एक अंधेरी गली पार करके हम हरी दीवारों वाले एक ऐसे घर के सामने पहुंचते हैं, जिसके मुख्य दरवाज़े पर बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर का एक विशाल पोस्टर चिपका हुआ है.
भीतर दाख़िल होते ही हमारी मुलाक़ात 45 वर्षीय देवकू असोडे से होती है. नारंगी रंग की मटमैली साड़ी पहने अपनी रसोई में बैठी देवकू सब्ज़ी काट रही थीं. हमें देखते ही उन्होंने रोना शुरू कर दिया. एक ग्लास पानी पीने और 5 मिनट की ख़ामोशी के बाद देवकू ने हल्की आवाज़ में बोलना शुरू किया.
दोनों ही बार मुझे अंदाज़ा नहीं हुआ कि मेरी बेटियां ऐसा कुछ कर करने वाली हैं. खेती के लिए हमें कर्ज़ा लेना पड़ा था. कर्ज़ा चुकाने को लेकर तनाव भी रहता है. लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि वह इतना बड़ा कदम उठा लेंगी”. बेटियों की फ़्रेम करवाई हुई तस्वीरें गोद में लिए बैठी देवकू के गमगीन चेहरे पर रसोई की खिड़की से गिरती धूप पड़ रही थी.
“बड़ी वाली उस दिन बिल्कुल सामान्य थी. उसने सुबह उठकर घर की सफ़ाई की. खाना बनाया. फिर बाल धोकर नहाई और खाना खाया. इसके बाद अचानक शाम के 4 बजे उसने ज़हर (कीटनाशक) खा लिया. तीन महीने के अंदर ही छोटी वाली ने भी ज़हर (कीटनाशक) पी लिया. वह भी पूरे दिन ठीक थी. शाम को टहलने छत पर गयी थी. वहीं उसने ज़हर पी लिया”
कहते कहते देवकू रुआंसी होकर दीवार को देखने लगती हैं.
बड़ी बेटी माधुरी को याद करते हुए वह कहते हैं, “वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती. बीज लगाने से लेकर रोपाई हो, दवा का छिड़काव या कपास चुनना हो. सारा काम करती थी. उसने मुझे कभी महसूस नहीं होने दिया कि वो मेरी परेशानियों से परेशान है. हमेशा मेरी हिम्मत बँधाती. कहती थी कि पापा सब ठीक हो जाएगा. पर घर के हालात तो सब उसके सामने ही थे.”
इतने कहते-कहते भास्कर फफक फफककर रोने लगते हैं.
इस परिवार के पास अपनी एक एकड़ ज़मीन है. पर उससे गुज़ारा न हो पाने के कारण भास्कर हर साल ज़मीन किराए पर लेकर खेती किया करते थे.  sex
“मैं बरसात और सर्दियों में 4-5 एकड़ ज़मीन मगते (किराए) पर लेकर खेती करता हूं. इस तरह साल में 10 से 12 एकड़ ज़मीन का किराया भरना पड़ता है. एक दो साल तो सब ठीक रहा लेकिन बीते साल जब बड़ी बेटी की शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गयी”.
भास्कर ने खेती के लिए साहूकारों से लेकर माइक्रो फ़ाइनेंस कंपनियों तक से कर्ज़ा लिया. ज़मीन किराए पर ली. फिर मज़दूरों, कीटनाशक और खाद पानी का ख़र्च मिलकर उनके 1.5 लाख रुपये निवेश में लग गए.
“दाम ठीक नहीं मिला. फ़सल निकली तो सिर्फ़ 90 हज़ार मिले 6 एकड़ में उपजी मूँगफली की फ़सल के. मुझे 90 हज़ार का नुक़सान हो गया. फिर भी हमने अगले मौसम में हिम्मत करके कपास उगाया. फ़सल अच्छी हुई लेकिन ठीक काटने से पहले उसमें बोंदड़ी (पिंक पेस्ट नामक कपास में लगने वाला कीड़ा) लग गयी. हमारी खड़ी फ़सल ख़राब हो गयी”.
दो-दो फ़सलें ख़राब होने के बाद भास्कर के घर में उदासी छा गयी. लगातार रोने से उनकी लाल हो चुकी आँखों में अब भी आंसू भरे थे. “हम मेहनत करने वाले किसान हैं मैडम. शरीर तोड़ मेहनत करते हैं, फिर भी कर्ज़ लेना पड़ा. एक तो कर्ज़ा देने वाले घर आने लगे और दूसरी तरफ़ फ़सलें ख़राब हो गईं. दाम नहीं मिले. घाटा लग गया और एक के बाद एक मेरे दो बच्चों ने आत्महत्या कर ली. जब मेरे बच्चे मरे, तब हम पर ढाई लाख का कर्ज़ा था. इसलिए इस साल दुखी होकर मैंने कोई फ़सल ही नहीं उगाई”.
भास्कर का परिवार खेती में होने वाले नुकसान का किसान परिवार पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का सटीक उदाहरण हैं. खेती में नुक़सान के बेटियों की शादी पर पड़े प्रभाव के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, “बड़ी बेटी को देखने रिश्ते वाले मेहमान आते रहते थे. कई बार बात तय भी हो जाती लेकिन हम हमेशा क़र्ज़ में डूबे रहते. कुछ नहीं तो मेहमानों को सदा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था. इतने भी पैसे नहीं बनते थे. कहां से करते शादी?
रिश्तेदार सब कहने लगे थे कि दो-दो जवान बेटियां घर में हैं. मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं. बस एक दिन अचानक चली गयीं”.
देवकू और भास्कर के दो बेटे हैं लेकिन खेती और घर से जुड़ा सारा आर्थिक व्यवहार स्वाति ही संभालती थी. परिवार बेटों को पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता था इसलिए वह खेती में कभी शामिल नहीं हुए.

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